भारतीय शेयर बाज़ार से विदेशी पोर्टफ़ोलियो निवेशकों (एफ़पीआई) की बिकवाली जारी है। डिपॉज़िटरी के आँकड़ों पर आधारित पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक़ अक्टूबर में अब तक एफ़पीआई भारतीय इक्विटी से 44,166 करोड़ रुपये निकाल चुके हैं।
यह सिलसिला सितंबर से जारी है, जब 35,861 करोड़ रुपये बाज़ार से बाहर गए थे। इससे पहले के दो महीनों में रुझान उलटा था। एनएसडीएल के आँकड़ों के अनुसार जुलाई में 20,200 करोड़ और अगस्त में 29,631 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया था।
पूरे साल की तस्वीर देखें तो 2026 में अब तक एफ़पीआई क़रीब 3.04 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं। तुलना करें तो 2025 के बारह महीनों में कुल 1.66 लाख करोड़ रुपये निकले थे। इस साल अब तक निफ़्टी में 13.87 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है।
बाज़ार के जानकार इस बिकवाली के पीछे कई कारण गिनाते हैं: कच्चे तेल की ऊँची क़ीमतें, मज़बूत अमेरिकी डॉलर, ऊँचे स्तर पर पहुँची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, और एआई से जुड़ी तेज़ी के चलते उत्तर एशियाई बाज़ारों की ओर बढ़ता पैसा।
एक निवेश प्लेटफ़ॉर्म के सह-संस्थापक वेदांत गुप्ते के अनुसार ये कारण भारत की किसी अंदरूनी कमज़ोरी की ओर इशारा नहीं करते। उनका मानना है कि पूँजी उन बाज़ारों की ओर जा रही है जिनका वैश्विक परिदृश्य फ़िलहाल बेहतर दिखता है।
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार वी.के. विजयकुमार के मुताबिक़ 2026 में भारतीय बाज़ार के कमज़ोर प्रदर्शन की सबसे बड़ी वजह एफ़पीआई की बिकवाली ही रही है। उनका कहना है कि जब अमेरिका के 10 साल के सरकारी बॉन्ड पर 5.2 प्रतिशत से ज़्यादा का जोखिम-मुक्त रिटर्न मिल रहा हो, तो निवेशकों का भारत से पैसा निकालना समझ में आता है। अगर अमेरिकी यील्ड ऊँची बनी रहीं, तो उनके हिसाब से बिकवाली आगे भी जारी रह सकती है।
स्रोत: आज तक




